रेल प्रशासन एवं मंत्रियों को हमारी जिंदगी खतरे में डालने का कोई हक नहीं है! आइये सुरक्षित रेल यात्रा के लिए एकजूट हो जाएं!

Submitted by admin on Tue, 2017-10-24 12:06

लोक राज संगठन तथा कामगार एकता कमिटी का निवेदन, अक्टूबर 2017

प्रिय  नागरिकों,
भारतीय रेल से सफर करना आए दिन ज्यादा खतरनाक तथा परेशान करनेवाला हो रहा है यह हम सभी के लिए बेहद चिंताजनक समस्या है।

  • हाल ही में एलफिन्सटन रोड स्टेशन में हुई दुर्घटना में कम से कम 23 लोगों की मृत्यु हुई, सैकड़ों घायल हुए और अनेकों पर स्थायी मानसिक आघात हुआ।
  • 1952 में, मुंबई सबर्बन रेल्वे से 29.2 करोड़ यात्री सफर करते थे, जो संख्या बढ़कर 2016 तक 270 करोड़ यानि 9 गुना बढ़ गई। मगर उसी समय में ट्रेनों की संख्या केवल 741 से 2800 यानि करीबन 4 गुना ही बढ़ी।
  • मुंबई की लोकल ट्रेन से रोजाना 75 लाख यात्री सफर करते हैं, जो कि रेलवे लोकल के डिब्बे तथा पटरियों की क्षमता से औसतन 2.6 गुना है!
  • इस भीड़ की वजह से, हर रोज 9 से 10 लोग या तो ट्रेनों से गिरकर या फिर पटरियाँ पार करते हुए मारे जाते हैं।
  • 2015 तक के 10 वर्षों में, 6989 यात्री ट्रेन से गिरकर और 22,289 पटरियाँ पार करते हुए मारे गए हैं।
  • 2015-16 के एक वर्ष में, पूरे देश भर जो दुर्घटनाएं हुई, उनमें से 84 प्रतिशत ट्रेनों के पटरी से उतरने के कारण हुई थी। देश भर में 114907 किलोमीटर रेल पटरियंा हैं। हर वर्ष उस में से लगभग 4500 किलोमीटर पटरियों का नवीकरण आवश्यक होता है। गत वर्ष इस तरह 5000 किलोमीटर पटरियों का नवीकरण आवश्यक था, मगर योजना तो केवल 2700 किलोमीटर के नवीकरण की ही बनाई गई!
  • रेल पटरी की मरम्मत के साथ जो खिलवाड़ और लापरवाही हो रही है, वही पटरियों टूटने एवं रेलवे ट्रेनें पटरी से उतरने का मुख्य कारण है। इस वर्ष के दौरान अब तक सेंट्रल रेलवे में 200 और वेस्टर्न रेलवे में 100 पटरी टूटने, सिग्नल फेल होने एवं तकनीकी खामियों की घटनाएं हुई हैं!
  • जिन पटरियों पर 50-60 किलोमीटर प्रतिघंटा से ज्यादा रफ़्तार से ट्रेन नहीं चलनी चाहिये, उन्हीं पर 120-130 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से ट्रेन चलाने के लिए रेल मंत्रालय इंजन ड्रायवरों पर दबाव डाल रहा है। इसी के साथ कई व्यस्त रेल मार्ग पर इतनी ज्यादा ट्रेन चलाई जाती हैं, कि पटरियों पर निर्धारित भार के 180 से 250 प्रतिशत भार आता है, जिससे पटरियाँ टूटने एवं ट्रेन पटरी से उतरने की संभावनाएं बढ़ती हैं।
  • रेलवे प्लेटफार्म, स्टेशन से आवागमन के लिए द्वार, फुट ओवर ब्रिज आदि आधारिक संरचना की ओर भी आवश्यक ध्यान नहीं दिया गया है। ज्यादातर आधारिक संरचना बेहद पुरानी है। उदहारण के लिए  एलफिन्सटन रोड के जिस ब्रिज पर दुर्घटना हुई, वह 1972 में बनाया गया था। दादर स्टेशन पर यात्रियों की भीड़भाड़ कई गुना बढ़ी है मगर गत 50 वर्षों में प्लेटफार्म की संख्या नहीं बढ़ाई गई है।
  • ऽ    रेलवे प्रशासन ने रेलवे सुरक्षा से संबधित हजारों मजदूरों के पद कई वर्षों से रिक्त रखे हैं!

    
इन हालातों के लिए कौन ज़िम्मेदार है और हम नागरिक क्या कर सकते हैं?
कई रिक्त पद कई वर्षों से ना भरने के कारण इंजन ड्रायवरों तथा गार्डों पर काम का बोझ बेहद ज्यादा बढ़ गया है। गैंगमन के कई पद रिक्त हैं, जिसकी वजह उन्हें भी बेहद जोखिमभरा काम बेहद ज्यादा करना पड़ता है। यात्री जब भी सफर करते हैं तब उन्हें खतरा महसूस होता है और लाखों रेल कर्मचारियों को उनके काम के दौरान खतरा उठाना पड़ रहा है। आखिर क्यों?

यह इसलिये कि कई वर्षों से रेल प्रशासन ने रेल डिब्बों की तथा इंजन की मरम्मत आदि जैसे महत्वपूर्ण काम निजी ठेकेदारों को देना शुरू किया है। पटरियों की देखभाल तथा मरम्मत का काम भी निजी ठेकेदारों को देना शुरू किया गया है। ये ठेकेदार कम से कम वेतन में मजदूरों को काम पर रखते हैं और उन्हें आवश्यक प्रशिक्षण भी नहीं देते हैं। पटरी से गाड़ी उतरने की घटनाओं के बढ़ने का यह एक मुख्य कारण है। उसी के साथ साथ एक सोची समझी नीति के तहत, इंजन ड्रायवर, गार्ड, स्टेशन मास्टर आदि स्थानों पर जो बड़ी संख्या में रिक्त पद हैं, उन्हें जानबूझकर नहीं भरा जाता है, जिससे मौजूदा कर्मचारियों पर काम का बोझ बेहद ज्यादा बढ़ गया है। इसलिए दुर्घटनाएं होने की संभावनाए भी बढ़ गई है।

रेलवे में निजीकरण यह निजीकरण एवं उदारीकरण के ज़रिये वैश्वीकरण की समूची निति का एक भाग ही है। इस निति को पहले कांग्रेस सरकार ने शुरू किया और उनके बाद सत्ता पर आई सभी सरकारों ने जारी रखा, चाहे वो भाजपा की हो या तीसरे मोर्चे की सरकार हो। एक के बाद एक सत्ता पर आई सभी सरकारों को आम जनता की खुशहाली की कोई फ़िक्र न थी और न है! उन्हें तो केवल अपने देश के सबसे अमीर करीब 150 उद्योग घरानों की माँगे पूरी करने में ही रुचि है। यही घरानें उन्हें चुनाव के लिए धन देते हैं। यह सरकारें उन घरानों का मुनाफ़ा और ज्यादा बढ़ाने के लिए आवश्यक नीतियाँ अपनाती हैं।

यात्री सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने अथवा यात्रियों का सफर ज्यादा आरामदायी बनाने के लिए , अपनी असमर्थता के समर्थन में सभी सरकारें कहती हैं कि उनके पास इसके लिए आवश्यक धन नहीं है। फिर बुलेट ट्रेन जैसी परियोजनाओं के लिए हज़ारों करोड़ों रूपये इकट्ठा करने के लिए सरकार को कैसे मुमकिन होता है? इस से यह स्पष्ट है कि रेल यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हमें सबसे पहले भारतीय रेल के निजीकरण की प्रक्रिया का विरोध करना होगा और यह माँग रखनी होगी कि यात्री सुरक्षा पर सबसे पहले धन लगाया जाए। इससे पहले जो निजीकरण हुआ है उसे ख़ारिज़ करने एवं रेलवे मज़दूरों तथा कर्मचारियों के सभी रिक्त पदोंपर भर्ती करने की माँग भी हमें उठानी होगी!

यदि रेलवे मजदूरों तथा यात्रियों की सुरक्षा एवं आराम को प्राथमिकता दी जाए तो उसे सुनिश्चित किया जा सकता है। एलफिन्सटन रोड स्टेशन में हुई दुर्घटना से कई समय पहले कई लोगों ने प्रशासन को इस तरह की दुर्घटना की संभावना से अवगत किया था मगर प्रशासन ने कोई कदम नहीं उठाया। इसकी मुख्य वजह यह है कि रेलवे का संचालन कैसे होना चाहिए यह तय करने में रेल मजदूरों एवं यात्रियों की कोई भूमिका नहीं है। नीतियाँ तय करनेवाले यानि कि रेल प्रशासन तथा मंत्रियों की यात्रियों या मजदूरों के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है। रेलवे के उच्चाधिकारी एवं मंत्रियों के निजी रिश्तेदारों या दूसरे करीबी दोस्तों को रेलवे असुरक्षा से कोई हानि नहीं पहुँचती है। जब भी कोई रेल दुर्घटना होती है तब लोगों का गुस्सा ठंडा करने के लिये प्रशासन एवं मंत्री शोरगुल और शोबाज़ी करते हैं मगर ये सभी आश्वासन चुनावी आश्वासनों जैसे ही होते हैं। जब हम एकजूट होकर जवाबदेही की माँग करेंगे तभी हालात बदलेंगे!

रेलवे से संबंधित अलग अलग व्यवस्था का नियंत्रण एवं लेखाजोखा और ऑडिट हम रेल मंत्रालय के हाथों में नहीं छोड़ सकते। हम ने एक होकर पहल लेनी चाहिये और जनता के हितैषी विशेषज्ञ, वालंटियर नागरिक, एवं रेल मज़दूरों की समितियाँ संगठित करनी चाहिये। रेल यात्री एवं रेल मज़दूरों की सुरक्षा हर हालत में सुनिश्चित करने के लिये इन समितियों ने सतर्क रहना चाहिए। सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक पैसा खर्च किये जाने की माँग इन समितियों ने करनी चाहिये। इस तरह नागरिक एवं रेलवे कर्मचारियों के सक्रिय सहभाग से ही भारतीय रेलवे में उच्च स्तर पर जो भ्रष्टाचार हो रहा है, उस पर रोक लगाई जा सकती है। यात्री एवं रेलवे मज़दूर अपनी एकता से भारतीय रेलवे में एक ऐसी आधुनिक आधारिक संरचना जुटाने के लिए सरकार को बाध्य कर सकते हैं, जो न केवल सुरक्षित होगी मगर यात्रियों के लिए आनंददायी भी होगी।

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